Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 185, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
गृहेऽन्तः संभवत्येव सप्तद्वीपा वसुंधरा ।
गेहं च शून्यमेवास्ते सत्यमेतदसंशयम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए घट, पट आदि पदार्थ भी अपने अधिष्ठानभूत चित् की सत्ता और स्फूर्तिवाले होने से
चिन्मात्रसार हैं ऐसा कहते है।
सदा अमूर्तं चिन्मात्रसार सब पदार्थ सृष्टि के आदि में एकमात्रस्वरूप होने के कारण स्फुरित होते
हैं