Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 185, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
संभवन्ति जगन्त्यन्तः सिद्धार्थकणकोटरे ।
न संभवन्ति च यथा ज्ञातमेतदशेषतः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे उनका भान होता है ? यह कहते हैं।
जैसे दही आदि द्रव्य में शक्कर आदि मिला दिया जाय तो मिला हुआ वह दही ओर शक्कर प्रत्येक
गुण की अपेक्षा अन्य गुणको (रुचि, पुष्टि, पित्तनाश आदि करनेवाले गुण को) उत्पन्न करता है वैसे ही
प्राणियों के अन्तःकरण में अभिव्यक्त प्रमातारूप चित्सार चक्षु आदि द्वारा बाहर निकलकर घटादि के
आकार की वृत्ति के सम्बन्ध से मिलकर घट, पट आदि तत् तत् विषयों के अधिष्ठान चित् के आवरणभंग
से परस्पर द्रष्टा, दर्शन और दृश्यरूप त्रिपुटी के स्फुरण को उत्पन्न करता है