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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 185, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 42

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

दर्शन की सामर्थ्य न होने पर स्मृति की कल्पना करनी पडती है । स्वप्न में केवल कल्पना से दर्शन में समर्थ चित्‌ की स्मृतिकल्पना नहीं दिखाई देती, ऐसा कहते हैं। चित्‌ के प्रसाद से आज भी संकल्प, स्वप्न आदि का अनुभव होता है शुद्ध चिदाकाशरूप नगर का (जगत्‌ का) चित्‌ के प्रसाद से कैसे स्मरण न होगा ?