Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 185, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 43
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हिन्दी अर्थ
अतएव गुण, दोष आदि में स्मरण से हर्ष, क्रोधरहित तत्त्वज्ञानी कुम्हार के चाक की तरह प्रारब्ध के
वेग से ही भ्रमण करते हैं, ऐसा कहते हैं।
हर्ष, क्रोध आदि से विहीन ज्ञानी चक्रों के समान दुःखपूर्ण हो चाहे सुखप्रद हो प्रस्तुत (प्रारब्ध
प्राप्त) मार्ग से ही चलते हैं