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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 44–45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 185, verses 44–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 44,45

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

बाधित स्मृति स्मृति नहीं है किन्तु वह अधिष्ठानमात्र का परिशेष है, ऐसा कहते हैं। निद्रा की समाप्ति होने पर स्वप्ननगर विषयक स्मृति में जैसे अधिष्ठानमात्र का परिशेष रहता है वैसे ही तीनों जगत्‌ के भ्रम को भी परम चिदाकाशात्मक समझो | संवित्‌ का आभासमात्र ही जो "जगत्‌" शब्द से कहलाता है उसे भी तुम केवल शान्त चिदाकाश ही जानो अन्य कुछ नहीं