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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 46–48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 185, verses 46–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 46-48

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

क्योकि सब प्रकार शान्त चित्‌ ही सब कुछ है, यह कहते हैं। जिसमें सब है, जिससे सब है, जो सब है, जो सब तरफ से है वही सर्वात्मा सर्वदा सर्वरूप से सर्वत्र स्थित है। यह ब्राह्मी सृष्टि जिस प्रकार है, आगे जो होगा और जिस प्रकार इस दृश्य जगत्‌ का भान होता है यह सब मैंने आपसे कहा । हे ब्राह्मणों अब आप दोनों उठिये, प्रातःकाल होते ही भ्रमर जिस प्रकार कमल पुष्प के पास जाते है वैसे ही अपने अभिष्ट सत्कर्मो का शीघ्र विधान कीजिये । मुञ्चे समाधि से रहित अवस्था में अत्यन्त दुःख हो रहा है, इसलिए मैं फिर समाधि में प्रवेश करता हूँ