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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 185, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

क्रमेण विलयं प्राप्ताः प्रलयेष्वर्णवा इव । मुक्तोऽसौ मे सखैवैक एकार्णव इवाष्टकः ॥ ५ ॥ ततः कालेन सोऽप्यस्तं दिनान्तेऽर्क इवागतः । अहं दुःखपरीतात्मा परं वैधुर्यमागतः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यह नानाता वास्तविक नहीं है, किन्तु भ्रान्तिजन्य है, वह जैसे चन्द्रमा के एक होने पर भी दो चन्द्रमाओं की प्रतीति होती है वैसे ही अविरुद्ध है, इस अभिप्राय से कहते है । कदम्बतपस्वी ने कहा : हे मुने, जैसे जलमें दृश्यमान भी आवर्त जल से अतिरिक्त नहीं हे वैसे ही यहाँ पर सब कुछ शान्त चिदाकाश ही है वह विस्ताररूप से दिखाई देता भी नाना (भेद) कुछ नहीं है । इन सकलपदार्थो की असत्ता में पदार्थरूप से जो ये भासित होते हैं वह स्वप्न ओर सुषुप्ति के समान अपने यथार्थ स्वरूप को भूला हुआ निज निर्मल चिदाकाशरूप अज्ञात स्वरूप ही हे