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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 19–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verses 19–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 19-21

संस्कृत श्लोक

अपामब्धिः प्रधानानां तेजसामेष भास्करः । स्पन्दस्य पवनो व्योम शून्यताया जगद्गतम् ॥ १९ ॥ पञ्चानामिति भूतानामाकरत्वेन संविदः । पञ्च तान्युचिता ब्राह्म्यः प्रश्नः किं भास्करं प्रति ॥ २० ॥ बुधा संविच्चिदित्युक्ता सर्वगा सर्वरूपिणी । सर्वत्र स्वमहिम्नैषा सर्वेणैवानुभूयते ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

वैसा करने पर भी (जीव के प्रति अपने स्थावर ओर जंगम शरीर बनाने पर भी) चित्‌ का भेद नहीं होता, किन्तु महाचित्‌ का अपने मे अध्यस्त सव अचेतन और चेतन नख, पैर आदि के समान अवयवरूप ही हैं, ऐसा कहते हैं। जैसे पुरुष के नख, पैर आदि एक ही शरीर हैं (शरीर के अवयव हैं) वैसे ही चित्‌ का स्थावर ओर जंगम एक ही अमूर्तं शरीर है। आदिम सृष्टि में हिरण्यगर्भ का (ब्रह्मा का) प्राथमिक सृष्टि में हेतुभूत संकल्प होने पर चित्‌ का जगत्‌ नाम का जो रूप जिस तरह प्रथा को (प्रसिद्धि को ) प्राप्त हुआ वह इस समय भी वैसे ही स्थित है। इस तरह चिरकाल से जड़ के रूप से यद्यपि वह स्थित है तथापि चिन्मय होने के कारण अप्रतिघ (अमूर्त), शान्त, ज्यों-का-त्यों स्वरूप से स्थित, कुछ भी प्रथा को नहीं प्राप्त हुआ, अतः वह अप्रथित है, यों उसके अपवाद द्वारा सृष्टि का अन्त कहा जाता है