Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 22–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verses 22–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मात्मा ब्रह्मबालोऽयं स्वसंवित्स्फुरणामिमाम् ।
व्योमात्मक्षौमभूनाम्नीं स्फारयत्यम्बराकृतिः ॥ २२ ॥
सा यदैतत्तथैतच्च चिरमत्त्यजसंविदा ।
तदा तदङ्गस्यार्कादेर्नाऽतो नोत्पादि चञ्चलम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार सृष्टिमात्र की त्रिकाल में असत्ता होने के कारण उसकी आदि और अन्त कल्पना भी
मिथ्या है, ऐसा कहते है ।
जैसे स्वाप्नप्रपंच की सुषुप्ति आदि प्रबोधान्तता निद्राकोष्ठ के अन्दर ही कल्पित होती है न कि
प्रबोधकोष्ठ के अन्दर वैसे ही सुघन निद्रावाली चिति के सुषुप्ति-स्वप्नकोष्ठ से ही सृष्टि का यह आदि
है, यह अन्त है यो आदि-अन्त का भान होता है वास्तव में असत् सृष्टि का आदि ओर अन्त क्या हो
सकता है ? चूँकि मुझ ज्ञानी के प्रति अद्रितीय (अखण्ड), आदि ओर अन्त से शून्य (जन्म-नाशविहीन)
परमार्थचन ही है, अतः सृष्टि, स्थिति ओर प्रलयो का नाम भी नहीं हे, उनके रूप की बात तो दूर
रही