Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
गर्भीकृत्य स्थिताऽनाख्या चिदाकाशापिधानताम् ।
संप्रति त्वतिशुद्धस्य पदस्यानन्यरूपिणी ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
जीव और जगत् का अभेद सिद्ध होने पर जगत् की चिन्मात्रता भी अपने आप सिद्ध हो गई, ऐसा
कहते हैं।
जैसे स्वप्न में सकल पदार्थसमूह चित् ही हैं और जैसे सुवर्ण में कुण्डल, कटक आदि रूपता
सुवर्ण ही है वैसे ही यह सम्पूर्ण पदार्थराशि चित् ही है। यदि इसे चित् से भिन्न मानो तो इसमें सत्ता
और स्फूर्ति का लाभ न होने के कारण यह अलीक (मिथ्या) हो जायेगी, इससे व्यतिरिक्त पदार्थता
ही सिद्ध न होगी