Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
स्वतैकभावनामात्रसारसंसरणोन्मुखी ।
तदा विनाभावकृता अनुतिष्ठन्ति तामिमाः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सागररूप एक प्रदेश में एकत्र होकर स्थित हुई ही जलराशि फेन,
बुदबुद्, लहर, आवर्त आदि पृथक् रूप से स्फुरित होती है वैसे ही ब्रह्म में भी नित्यस्थित अभिन्न
दृश्यरूप चितियाँ पृथक् रूप से स्फुरित होती हैं