Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
एवंप्रायात्मिका सा चिद्बीजं संकल्पशाखिनः ।
अहंतां भावयत्यन्तः सैवेह भवति क्षणात् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे शान्त है, कैसे अपने स्वरूप का त्याग नहीं करता है 2 इस आशंका पर कहते है।
इन विश्व ओर संवित् की परस्पर समता, सत्यता, सत्ता, एकता, निर्विकारता पाँच प्रकारो से भेद
की प्रतीति न होने के कारण वह शान्त है और आधारआधेयभाव से स्तम्भ ओर प्रतिमा के तुल्य थोड़ा-
बहुत भेद का आभास होने से वह स्वरूप का त्याग नहीं करता यह अर्थ हे