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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

जीवाभिधाना सैषाद्य भावाभावप्लवभ्रमैः । भ्रमत्यात्मपदे वीचिरूपैर्वारीव वारिणि ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

विश्व ओर संवित्‌ में प्रातिभासिक भेद है वास्तव मे तो भेद का अभाव है, ऐसा कहते हैं । स्वप्न ओर संकल्प के संसार की तरह वर ओर शापसे नन्दी ओर नहुष के देवत्व ओर सर्पत्व प्रतिभान दृष्टियों का तालाब, सागर और नदी के जलो की तरह व्यवहारयोग्य भेद है, परमार्थतः भेद नहीं है