Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
चिदेवंभावनवती व्योमतन्मात्रभावनाम् ।
स्वतो घनीभूय शनैः खतन्मात्रं प्रचेतति ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, वर ओर शापरूप अर्थ संवित् में कार्यकारणता कैसे
हो सकती है ? उपादान के बिना कार्य हो ही नहीं सकता इसे आप कृपाकर कहें । नन्दी के मनुष्य-
शरीर में देव-शरीर का उपादानभूत चन्द्रामृत नहीं है इसी तरह चन्द्रामृतरचित नहुष के देव-शरीर
में साँप के शरीर के उपादानभूत सर्प अंडे आदि नहीं है । उपादान के बिना संसार में कहीं पर भी
कार्य नहीं होता । ऐसी परिस्थिति में वहाँ दोनों जगह नन्दी ओर नहुष में देवता और सर्प के शरीर
की सिद्धि कैसे हुई ? यह श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्न का आशय हैँ