Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
भाविभूगोलकत्वेन बीजमाकृतिशाखिनः ।
सर्वाधारात्मनस्तस्मात्संसारः प्रसरिष्यति ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो निरावरणज्ञानशून्य केवल उग्र तपर्वियो के वर, शाप आदि मोघ (निष्फल) होगे ? इस
आशय से कहते है।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, निरावरण ज्ञान से शून्य केवल उग्र तप आदि धर्म करनेवाले
तपस्वी जैसे क्रोधवश शाप ओर अनुग्रह से वर आदि देते हैं वैसा मुझसे कहिये