Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
अजात एव संजातस्तन्मात्राणां गणस्त्विति ।
अनाकारोऽपि साकारः संपन्नः कल्पनावशात् ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
उनके भी वर ओर शाप आदि की सत्यता हो, सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के संकल्प से ही उनकी
मोघता (निष्फलता) नहीं होती है यह उत्तर देने के लिए श्रीवसिष्ठजी भूमिका बोधिते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, चूँकि आदिम सृष्टि में ब्रह्म ब्रह्म मे जिसका संकल्प करता है वह
उसीका अनुभव करता है इसलिए सबकी ब्रह्मता है, उसका (ब्रह्मता का) प्रतिबन्धक अन्य नहीं
है