Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
शब्दं येन प्रदेशेन वेत्ति श्रोत्रं तदुच्यते ।
स्पर्शं येन प्रदेशेन वेत्ति तत्तु त्वगिन्द्रियम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह प्रथम प्रजापति जो जो संकल्प करता है शीघ्र वह
वैसा ही हो जाता है उसीकी कल्पना यह जगत् हे