Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 66
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
रसं येन प्रदेशेन वेत्ति तद्रसनेन्द्रियम् ।
गन्धं येन प्रदेशेन वेत्ति घ्राणेन्द्रियं तु तत् ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
वह कल्पना कैसी है ? यह वताते है।
आधाररहित, निरालम्ब चिदाकाश ही अपने स्वरूप में जगत्रूप से भासमान होता है जैसे कि
किसी दूषित दुष्टिवाले पुरुष को आकाश में वर्तुलाकार केशों का गुच्छ या मोतीयों की पंक्ति दीखती
है