Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 78–79
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verses 78–79 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 78,79
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
पहिले तो बारवार ब्रह्म मे जगत् अध्यस्त है ऐसा कह चुके है अव यह जन्मरहित वियाट् का अगरवर्ती
है यह कैसे कहते हैं ? इस शंका पर कहते हैं।
विराट्रूप ब्रह्म ही मैं हूँ, विराट्रूप आत्मा का देह ही जगत् है । ब्रह्म और जगत् में शून्यत्व ओर
आकाश की तरह कोई भेद नहीं हे । जैसे पर्वत से गिरनेवाले झरने में जल की विचित्र कणपंक्तियाँ
गिरती हैं और ऊपर उछलती हैं वैसे ही विचित्र देश और काल भी इस ब्रह्म में ही आविर्भूत और
तिरोहित होते दिखाई देते हैं