Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 80
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 80 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 80
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हिन्दी अर्थ
जैसे कल्पपर्यन्त एक ही धारा से गिरकर जलकण, जो मन, बुद्धि आदि से रहित हैं, सहस्रो
करोड भेदों मे विभक्त होकर भी फिर अपने एक प्रवाहरूप में ही भासते हैं वैसे ही विचित्र ब्रह्मसंवित्
(जगद्भेद) भी आत्मा से निकलकर करोड़ों भेदों मे विभक्त होकर फिर स्वात्मा मेँ ही भासती
हैं