Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 81
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 81 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 81
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हिन्दी अर्थ
केवल इतनी ही विशेषता है कि कणपंक्तियाँ मनोबुद्धिआदि से वर्जित है किन्तु उन
ब्रह्मसंविदों ने तो स्वस्वदेहों में मनोबुद्धिआदि की स्वयं कल्पना करके, जलों की द्रवता की भाँति
सर्ग की शोभा को भोग्यरूप से स्वीकार किया है