Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 82
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 82 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 82
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हिन्दी अर्थ
मनोबुद्धिआदि कल्पना का त्याग होने पर तो जगत् अज्ञानमात्र पर्यवसित होता है, इस आशय से
कहते हैं।
इस प्रकार मनोबुद्धि आदिविक्षिप्त अज्ञानस्वरूप दुर्बोध से यह जगत् है। अज्ञान से रहित मेरी
दृष्टि में तो यह सारा जगद्रूपी कर्म कारणरहित, द्वैतविहीन अनुत्पन्न (त्रिकाल में अनुत्पन्न) केवल
ब्रह्म ही है