Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 87
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 87 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 87
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हिन्दी अर्थ
चेतन में जाञ्यानुभव की अप्रसिद्धि का वारण करते हैं।
जैसे विषयान्तर मे आसक्तिवाले पुरुष के अंगुष्ठ या अन्य अंगुली से पवन, धूप या धूलि का स्पर्श
होने पर उत्पन्न हुआ भी अनुभव अनुत्पन्न प्राय ही होता है यह प्रसिद्ध हे । वेसा ही पाषाण आदि में
विद्यमान भी अविद्यमानप्राय अनुभव जडतारूप हे