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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 88

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 187, verse 88 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 88

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

ऐसे ही जड़ को भी चेतनभाव का अनुभव प्रसिद्ध है, यह कहते हैं। आकाश, पत्थर, जलादि को जैसे विराट्‌ देहभाव में अथवा तत्तदधिष्ठातृदेवता-देहभाव में अनुभव होता है वैसे ही प्रलयकाल में चित्तादि से रहित हम लोगों को आज यानी सृष्टिकाल में नाना प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं