Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
इत्येवं स्वप्नसंकल्पपुरवत्त्रिजगद्भ्रमः ।
भात्यर्थकार्यप्यवपुः शून्यमप्रतिघात्मकम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव चित् के स्फुरण के अनुसार से ही सव नियमव्यवस्था है। क्षण में भी यह कल्प है' यों चित्
का स्फुरण होने पर उसके अकल्पत्व का साधक दूसरा कुछ नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
क्षणभर जो चित् का स्फुरण है वह यह सर्ग है यों जाना गया है ओर क्षणभर जो चित् का स्फुरण है
वह यह कल्प हे यों जाना गया हे