Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
बोधादविद्यमानत्वादविद्येत्युच्यते बुधैः ।
इत्यादिकलनस्यास्य नामानि कथितानि ते ॥ ८ ॥
एतत्कलनमाद्यन्तमनाकारमनामयम् ।
आतिवाहिकदेहोक्त्या समुदाह्रियते बुधैः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत्. स्वप्न ओर सुषुप्ति तीन अवस्थाओं की चित्स्वभावता का विविध दृष्टान्तो से समर्थन
करते हैं।
जैसे आकाश में शून्यता भिन्न नहीं है, जैसे कपूर में सुगन्धि अतिरिक्त नहीं है तथा जैसे धूप में
उष्णता भिन्न नहीं हे वैसे ही चित् में जाग्रत् आदि अवस्थाएँ अन्य (भिन्न) नहीं हैं। बीजांकुरन्याय से
सृष्टि ओर प्रलय प्रवाह के अनादि होने से चिन्मात्रआकाशरूप सृष्टि -प्रलयनामक एक ब्रह्मस्वरूपमें ही
यह एक प्रवाह की अनन्य सत्ता से स्थित है इससे भी नियत अर्थक्रिया की सिद्धि है, यह अर्थ है