Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 16–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verses 16–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
स्वतश्चितिघनोऽचित्त्वाच्चिद्भानमिदमात्मनः ।
आतिवाहिकदेहाभं क्रमेणानेन चेतति ॥ १६ ॥
स आतिवाहिको देहस्तदालोकप्रवर्तितः ।
कैश्चिद्ब्रह्मेति कथितः स्मृतः कैश्चिद्विराडिति ॥ १७ ॥
कश्चित्सनातनाभिख्यः कश्चिन्नारायणाभिधः ।
कश्चिदीश इति ख्यातः कश्चिदुक्तः प्रजापतिः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, संविन्मय विभिन्न वृत्तियों में भी जो चिदाभास संविदों का स्फुरण होता है वही उनका
स्वभाव है । वृत्तियों के विषय पृथिवी, जल, तेज, वायु आदि में उन वृत्तिआभास संविदों ने अपने
शरीर-तुल्य उन वृत्तिभेदों के मध्य में जिन जिन वृत्तियों की जैसे जैसे आकार की कल्पना की, वह
आकार ही उनका स्वभाव है