Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
महाकल्पस्य पर्यन्ते सर्वनाशे स्थिरे स्थिते ।
महाशून्यपदे प्रौढे ब्रह्मात्मनि निरामये ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे संवित् अंशभूत जीव का सर्वानुगतचित्स्वरूप ही स्वभाव है वैसे ही अपने स्वरूप
का त्याग न कर रहे अग्नि आदि एक ही वस्तु का, देश, काल आदि भेद से अनेकता को प्राप्त होने पर
भी, जो एक सर्वानुगत उष्णत्व, प्रकाशरूप स्वभाव है वही उसके विविध भेदों मे अनुगत स्वभाव है