Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
एष चित्तमयो देहो जगन्त्यन्तर्बहिस्त्वपि ।
प्रतिबिम्बमिवादर्शः शून्य एव नभो यथा ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
अब (कर्थं स्वभावो भावानाम्" इस प्रश्न का समाधान करते हैं।
कल्पनाम के ब्रह्म के निमेष तक पदार्थों का जो एक रूप से (अति उष्ण, जल शीत आदि रूप से)
स्फुरण है उसीको स्वभावतत्त्ववेत्ता मतिमान् पुरुष स्वभाव (प्रत्येक वस्तु में नियम से रहनेवाला स्वभाव)
कहते हैं