Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अनादिमत्परं ब्रह्म न सद्यन्नासदुच्यते ।
तदेवेदमनाद्यन्तं तथास्थितमवेदनम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति ही संवित् कही गई हे । सब कुछ की प्रकाशक होने के कारण
सर्वज्ञ सर्वरूप सर्वगामिनी वह स्वप्रकाशतारूप स्वमहिमा से ही सर्वत्र स्वभावरूप परमाकार ओर
नियति रूप से सबके द्वारा अनुभूत होती है