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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

आतिवाहिकदेहस्य तस्यानुभवतः स्वयम् । याति व्यसनिनः स्वप्नः कान्तेव परिपुष्टताम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह चतुर्मुखनामधारी ब्रह्म-बालक स्वात्मभूत संवित्‌ के स्फुरण आकाशरूप आवरणवाली इस पृथिवी का स्वयं ब्रह्मस्वरूप होने के कारण आकाशाकृति ही होकर अपने में विस्तार करता है