Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
शून्योऽप्यनाकृतिरपि घटाकारोऽनुभूयते ।
स्वप्नसंकल्पयोः स्वस्य देहस्य जगतो यथा ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जव वह मायाशबल सर्वज्ञसंवित् ब्रह्मा की
संवित् के साथ स्थूल और सूक्ष्म प्रपंच का अपने में संहार करती है तब चतुर्मुखसंवित् के अंगभूत
सूर्य आदि का च॑चलरूप उसने उत्पन्न नहीं किया । चूँकि ऐसा है अतः उपसंहार से भक्षक पुरुष ही
होता हे