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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 26–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verses 26–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 26-28

संस्कृत श्लोक

चेतत्यस्थिगणः स्थूलं कराद्यवयवावलिम् । त्रिकलोमशिरास्नायुसंनिवेशतया स्थितम् ॥ २६ ॥ जन्मकर्मेहितस्थानं परिणामवयःस्थितम् । देशकालक्रमाभोगभावार्थायोद्भवभ्रमम् ॥ २७ ॥ जरामरणमाधानदशदिङ्मण्डलक्रमम् । ज्ञानज्ञेयज्ञातृभावमादिमध्यान्तवेदनम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

वास्तव में तो ये सकल पदार्थ न उत्पन्न ही हुए हैं और न दिखाई ही देते हैं | ज्ञानी पुरुष को यह सब स्वप्न के दृश्य के समान चिदाकाश ही प्रतीत होता हे । चिन्मात्रस्वरूप सर्वेश्वर आप, मैं और सबरूप से अत्यन्त दृश्य के समान प्रसिद्ध होकर स्फुरित होता है। वास्तव में न स्फुरित ही होता है ओर न नष्ट ही होता है । चूँकि चिदाकाश का चिदाकाश में स्वप्नदर्शन की भति स्फुरण होता है अतएव चिदाकाशता के सिवा इस जगत्‌ का पारमार्थिरूप क्या हो सकता है