Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
क्षितिजलगगनदिवाकरजनताव्यवहारनगरशिखरात्मा ।
स्वाधाराधेयमयं पश्यति वपुषः पुरातनः पुरुषः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
वह पारमार्थिक
सद्रूप ही अध्यस्त में जितने समय तक घट आदि की विद्यमानता रहती है तब तक तद्रूप से स्फुरित
होता है उसी का स्वभाव, नियति आदि विविध शब्दों से कथन होता हे