Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
जीवनाच्चेतनाज्जीवो जीव इत्येव कथ्यते ।
चेत्योन्मुखतया चित्तं चिदित्येव निगद्यते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
नियत ईश्वर शक्ति का अन्यथाभाव तो हो नहीं सकता, इसलिए नियति में कोई व्यभिचार नहीं
हुआ, इस आशय से कहते हैं।
सर्वशक्तिमान् परमात्मा को जिस जिस का जैसे भान होता है वह वह वैसे ही सत् है।
सत्यसंकल्पसंवित् संवित्सार है उसे जिसका भान होता है वह अभान कैसे होगा ? उक्त संवित्सार
सत्यसंकल्पसंवित् हम लोगों के स्वप्न ओर मनोरथ की संवित् के समान असार नहीं है जिससे उसका
भान अभानता को प्राप्त हो