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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

इदमित्थमिति स्पष्टबोधाद्बुद्धिरिहोच्यते । कल्पनान्मननज्ञत्वान्मन इत्यभिधीयते ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्यो -के-त्यों अपने स्वरूप में स्थित ब्रह्म का, चित्‌ होने के कारण, चिरकाल तक जैसा स्फुरण होता है माया के उदर मेँ स्थित उसी का सृष्टिकाल में भान होता है तथा प्रलयकाल में सूक्ष्म होने के कारण वही अभानसदृश हो जाता है । वही अनादि सकल वस्तुओं की अर्थक्रियाशक्ति है और वही नियति है