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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अस्मीति प्रत्ययादन्तरहंकारश्च कथ्यते । चेतनाढ्यमृतं चित्तमिति शास्त्रविचारिभिः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा नियत सकल अथक्रिया में समर्थ ब्रह्म ही जयदाकारता धारण करता है, इसलिए भी नियति प्रतिष्ठा की सिद्धि होती है, ऐसा कहते हैं। यह इस प्रकार का है और यह इस प्रकार का है यों स्वयं ब्रह्म का ही जो स्फुरण है सृष्टि और प्रलय का रूप धारण करनेवाला वही नियतिनामवाला कहा गया है