Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 47–48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verses 47–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 47,48
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हिन्दी अर्थ
उसकी जीवसमष्टि हिरण्यगर्भकूप से स्थूल पंचभूतकल्पना को कहते है।
इस प्रकार भावनावाली चिति सूक्ष्म आकाशतन्मात्र भावना को धीरे धीरे घनी करके स्वयं स्थूल
आकाश की भावना करती है । वह स्थूलाकाशरूप चिति भावी नाम ओर अर्थरूप शब्दराशिलक्षण
महावृक्ष की बीजभूत और पद, वाक्य, प्रमाणो से पूर्ण वेद, शास्त्र के अर्थ की आधारभूत है