Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 58
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हिन्दी अर्थ
शब्द में प्रदर्शित न्याय रस आदि में भी समझना चाहिये, ऐसा कहते है ।
इस प्रकार रसतन्मात्र ओर गन्धतन्मात्र की भी स्वप्न के समान कल्पना की जाती हे, जो निपट
असत्य होते हुए भी सत् के तुल्य हैं