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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 57

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सृष्टि के आदि में समष्टि की तरह इस समय व्यष्टि में भी तत्‌ तत्‌ की संवित्‌ ही अपने में तत्‌ तत्‌ अर्थ के आकार का अध्यास कर जगत्‌के स्वरूप से भासती है अन्य नहीं भासता है, ऐसा समझना चाहिये, ऐसा कहते है । उस अवस्था मेँ दूसरा शब्द कर्ता कौन होगा जैसे उस समय द्वैत ओर एेक्य का अत्यन्त असंभव था वैसे ही इस समय भी द्वैत ओर एेक्य का अत्यन्त असंभव है