Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 56
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हिन्दी अर्थ
शब्दसंवेदनरूप शब्द स्वतः ही अनुभूत होता है। जैसे आकाश आकाश से ही आकाशरूप
कोश में अवकाश पाकर स्थित होता है अन्य से नहीं वैसे ही संवेदन भी आकाशात्मक ही शब्द से
शब्दग्राहक है, उससे अन्य नहीं है, यह अर्थ है