Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 55
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हिन्दी अर्थ
प्रकाशानुभव की ही रूपतन्मात्रता का उपपादन करते है ।
प्रकाश चेतन ही तेज हे । तेज अन्यकृत नहीं है, स्पर्श की कल्पना ही स्पर्श है अन्य स्पर्श का कारण
नहीं हे