Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 54
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हिन्दी अर्थ
उसी तरह पवन स्कन्धभूत उस हिरण्यगर्भ चिति मेँ चिद्विलास के
प्रकाश से जो अनुभव होता है वह रूपतन्मात्र है वह भावी तेज आदि भूतो का स्वरूपप्रद हे