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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 52–53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verses 52–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 52,53

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

उसके स्वनिर्मित भूतभौतिक प्रपंच के भोग के लिए समष्टि त्वचा आदि इन्द्रियो की कल्पना का प्रकार कहते हैं। उक्त चिति अद्यावधि शब्द व्यवहार और शरीरादि द्वारा व्यवहार को प्राप्त न होकर, जीव होने के कारण, चेतन से काकतालीय के समान स्वयं स्पन्द चिन्मात्र की कल्पना करती हे । उक्त चिति वायुसमूहरूप त्वक्स्पर्शरूपी वृक्ष की बीजभूत हे, क्योकि उसमें सब प्राणियों की क्रियारूपी स्पन्द का हेतु वायु उत्पन्न होगा