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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 50–51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verses 50–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 50,51

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार के विचित्र संकल्पवाली ब्रह्म चिति ही जीव शब्द से कही जाती है, उससे अन्य नहीं है । वही भावी शब्द और अर्थराशि से भूतसंघरूपी वृक्ष की बीजभूत हे । चौदह भुवनो मे निवास करने के कारण चौदह प्रकार की भूतराशि ओर आकाश को व्याप्त किये हुए जगत्रूप जीर्णपत्रों की राशि उक्त समष्टिजीवभूत हिरण्यगर्भरूप चिति से प्रकट होगी