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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 67–68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 188, verses 67–68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 67,68

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त द्विविध परिच्छेद की तरह देह पिण्ड में अहंभावग्रयुक्त इसकी दिक्काल के भेद की कल्पना कहते हैं। नियत आकृति को प्राप्त हुआ यह जीव दिक्काल की कल्पना करता है ओर असर्वात्मता के दोष से सकल अंग से यानी नेत्र, श्रोत्र, आदि से रस,गन्ध आदि सब कुछ जानता है । इस रीति से प्रत्येक जीव में अनुक्त भी अनन्त सांसारिक कल्पना आत्मा के अन्तर्गत ही अनुमेय है अनन्त होने के कारण प्रत्येक का पृथक्‌ पृथक्‌ कथन अशक्य है ओर वे अनन्त कल्पनाएँ आत्मा से अभिन्न (आत्मभूत) ही है, इसलिए वे परमार्थरूप से न उदित होती हैं और न नष्ट होती हैं किन्तु पत्थर के गर्भ के समान सच्चिदानन्देकघन निर्व्यापार ही स्थित हैँ