Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 189, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आतिवाहिकदेहोऽसौ तस्याद्यस्य प्रजापतेः ।
काकतालीयवच्चित्त्वाद्यद्यथेत्यादि चेतति ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी यह उत्पत्ति उपचारतः (गौणीवृत्ति से)
लिंग देह की भ्रान्ति से प्रतीत होती है, इस बात का स्पष्टतः निरूपण ।
पिछले सर्गा में घन संवेदनात् पश्चाद् भाविजीवादिनामिका” इत्यादि से जीव की उत्पत्ति का
उपपादन किया गया है । वह उचित नहीं है, क्योकि नवीन उत्पन्न हुए जीव के संसार के (आवागमन
के) हेतु काम, कर्म, वासना आदि के अभाव से संसार की सिद्धि नहीं होगी और घट, पट आदि के
समान मिथ्या होने से ब्रह्मात्मभाव न होने के कारण मोक्ष की सिद्धि भी नहीं होगी ऐसी आशंका
श्रीरामचन्द्रजी को न हो, इसलिए उक्त जीवोत्पत्तिप्रतिपादन का तात्पर्य भगवान् श्रीवसिष्ठजी स्वयं
कहते हैँ ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचंद्रजी, इस चिदाभासात्मक जीव की जो वह उत्पत्ति कही है
वह चिदाभासात्मक जीव ब्रह्म से अभिन्न है ऐसा आपको बोध कराने के लिए कही है, किन्तु जीव की
उत्पत्ति आदि वास्तव है इस आशय से नहीं कही हे
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अड्जसीवाँ सर्ग जीव ब्रह्म ही है ।