Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 189, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
तत्तथा स्थितिमायाति चिरं संवित्स्वभावतः ।
बत विश्वमिदं भातमत्रासत्ये कुतः स्मयः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
किस रीति से जीव परम ब्रह्म से अभिन्न है यह बोध कराने के लिए उसे कहते हैं।
वह कलन (चिदाभास) परब्रह्म का इस प्रकार का ओपाधिक अवयव है, अतएव अकृत्रिम हे । चेत्य
की ओर प्रवण चिदाभास जीवशब्द से कहा जाता है, ऐसी दशा में ब्रह्म से चिदाभास का जो पृथकत्व है
वह ओपाधिक है, उससे होनेवाले जीव आदि भिन्न-भिन्न नाम परम ब्रह्म के ही हैं जैसे कि आकाश के
घटाकाश, मठाकाश आदि भिन्न भिन्न रूप ओर नाम हें