Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 189, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यो हि यन्मय एवासौ स न पश्यति तत्कथम् ।
असत्यैव जगद्भ्रान्तिरेवं प्रौढिमुपागता ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
तब चैतन्न परमात्मा चैतन्य का आवरण करनेवाले
अज्ञानरूप निमित्त से पूर्वोक्त क्रम से आत्मा के आतिवाहिक देहतुल्य चिद्भान की स्वतः कल्पना
करता हे