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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 189, Verses 23–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 189, verses 23–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 189 · श्लोक 23-29

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ से सर्वथा शून्य ब्रह्मा का जगद्रूप से भान होने में दूसरा दृष्टान्त देते हैं। स्वप्न ओर मनोरथ में शून्य भी निराकार भी घटाकार का अनुभव होता हे, यही स्वदेह ओर जगत्‌ के भान में दृष्टान्त है । जगत्‌ प्रपंच चिदाकाशस्वरूप स्वप्नपदार्थ के समान पूर्णतया अर्थक्रियाकारी होता है, आकाशात्मक होता हुआ ही कठिन (ठोस) पदार्थ-सा प्रतीत होता है । यह आतिवाहिक जीव निराकार, शून्य स्वप्नतुल्य असत्‌ होने पर भी क्रम से अपने देहादि आकार का स्वयं अनुभव करता हे । उक्त आतिवाहिक देहरूप जीव अस्थिपंजर से स्थूल, रीढ़, रोम, नसों और नाडियों के संनिवेशरूप से स्थित हस्त, पाद आदि अवयवो से युक्त स्थूल शरीर की जो जन्म, कर्म ओर अभिलाषा का स्थान है और परिणामअवस्था में स्थित हे, देश, काल क्रम, शब्द इत्यादि विषयों के भोग के लिए कल्पना करता है ओर उस स्थूल देह में जन्म-भ्रम की कल्पना करता हे । तथा बुढापा और मृत्यु की, गुण, दोष आदि के आधान की, दश दिशाओं में भ्रमण की, ज्ञाता, ज्ञेय ओर ज्ञानस्वरूप त्रिपुटी की तथा सब पदार्थो के जन्म, स्थिति और नाश के ज्ञान की भी कल्पना करता है । इस प्रकार आतिवाहिक देहभूत पुराण पुरूष अपने से कल्पित ही व्यष्टिसमणष्टि स्थूल शरीर से स्वयं ही पृथिवी, जल, आकाश, सूर्य, जनता-व्यवहार, नगर ओर शिखररूप होकर पृथिवी आदि मेरे आधार हैं ओर स्वयं मेँ उनका आधेय हूँ इस प्रकार भ्रान्तिरूप संसार स्वप्न को देखता हे